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TMC में बड़ी टूट का दावा! 20 सांसदों के NCPI में विलय की खबर से मचा सियासी भूचाल, लेकिन पार्टी नेताओं ने ही खड़े किए सवाल

 


पश्चिम बंगाल की राजनीति में उस समय बड़ा सियासी भूचाल आ गया जब दावा किया गया कि तृणमूल कांग्रेस (TMC) के 20 बागी सांसदों ने नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया (NCPI) में विलय का फैसला कर लिया है। इतना ही नहीं, इन सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष से मुलाकात कर अलग राजनीतिक पहचान की मांग भी कर दी। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम में उस समय नया मोड़ आ गया जब जिस पार्टी में विलय का दावा किया गया, उसी पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने इस मामले से अनभिज्ञता जाहिर कर दी।

NCPI के संस्थापक और राष्ट्रीय संगठन सचिव शांतनु दे ने मीडिया से बातचीत में कहा कि उन्हें इस कथित विलय की जानकारी किसी आधिकारिक माध्यम से नहीं बल्कि सोशल मीडिया और समाचार चैनलों के जरिए मिली। उनके इस बयान ने पूरे घटनाक्रम को और अधिक रहस्यमय बना दिया है तथा राजनीतिक गलियारों में कई नए सवाल खड़े कर दिए हैं।

सोशल मीडिया से मिली जानकारी

शांतनु दे ने कहा कि उन्हें शनिवार शाम को इस पूरे मामले की जानकारी मिली। उन्होंने बताया कि सोशल मीडिया, न्यूज चैनलों और पार्टी के कुछ अन्य नेताओं से उन्हें इस खबर के बारे में पता चला। उनके अनुसार अब तक उनसे इस विषय पर किसी भी सांसद या संबंधित नेता ने कोई औपचारिक संपर्क नहीं किया है।

उन्होंने कहा कि यदि वास्तव में सांसद उनकी पार्टी में शामिल होना चाहते हैं तो उनका स्वागत है, लेकिन इसके लिए संवैधानिक और कानूनी प्रक्रिया का पालन करना आवश्यक होगा। शांतनु दे ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि किसी भी राजनीतिक विलय के लिए औपचारिक बातचीत और संगठनात्मक सहमति जरूरी होती है।

उनका कहना था कि उनकी पार्टी अभी छोटी है और यदि उसका विस्तार होता है तो यह उनके लिए खुशी की बात होगी, लेकिन सब कुछ संविधान और नियमों के तहत होना चाहिए। उनके इस बयान ने उन दावों की गंभीरता पर सवाल खड़े कर दिए हैं जिनमें 20 सांसदों के विलय की बात कही जा रही है।

पार्टी अध्यक्ष से भी नहीं हुई चर्चा

मामले को और दिलचस्प बनाते हुए शांतनु दे ने यह भी बताया कि पार्टी अध्यक्ष शिवली गुंडू ने भी इस विषय पर उनसे कोई चर्चा नहीं की है। उन्होंने कहा कि अभी तक उन्हें पार्टी अध्यक्ष की ओर से कोई फोन कॉल या औपचारिक सूचना प्राप्त नहीं हुई है।

उन्होंने यह भी कहा कि यदि इतना बड़ा राजनीतिक निर्णय लिया गया है तो संगठन के वरिष्ठ पदाधिकारियों को इसकी जानकारी होना स्वाभाविक है। उनके अनुसार पार्टी नेतृत्व को इस विषय पर स्पष्टता लानी चाहिए ताकि कार्यकर्ताओं और समर्थकों के बीच भ्रम की स्थिति समाप्त हो सके।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि किसी भी दल में बड़े स्तर पर शामिल होने या विलय जैसी प्रक्रिया बिना शीर्ष नेतृत्व की जानकारी के होना असामान्य माना जाता है। ऐसे में शांतनु दे के बयान ने पूरे घटनाक्रम की विश्वसनीयता पर नई बहस शुरू कर दी है।

NDA और मोदी सरकार के समर्थन में खुलकर बोले शांतनु दे

इस पूरे विवाद के बीच NCPI का राजनीतिक रुख भी चर्चा का विषय बन गया है। शांतनु दे ने खुलकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भारतीय जनता पार्टी की नीतियों का समर्थन किया है।

उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में देश में विकास की गति तेज हुई है और भारत की वैश्विक पहचान मजबूत हुई है। शांतनु दे के अनुसार उनकी पार्टी भाजपा की कई नीतियों से सहमत है और वे दिल से प्रधानमंत्री मोदी के कार्यों का समर्थन करते हैं।

यह बयान इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि यदि वास्तव में TMC के सांसद NCPI में शामिल होते हैं तो इससे पश्चिम बंगाल की राजनीति में नए समीकरण बन सकते हैं। TMC को भाजपा का प्रमुख राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी माना जाता है और ऐसे में भाजपा समर्थक रुख रखने वाली पार्टी के साथ किसी भी प्रकार का जुड़ाव राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जाएगा।

महज तीन साल पुरानी पार्टी बनी चर्चा का केंद्र

नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया यानी NCPI का गठन हाल के वर्षों में हुआ है। वर्ष 2023 में पंजीकृत इस राजनीतिक दल का नाम राष्ट्रीय राजनीति में अब तक बहुत अधिक चर्चित नहीं रहा है। पार्टी का मुख्य कार्यालय हावड़ा जिले के संकरैल क्षेत्र में स्थित है।

हालांकि पार्टी ने त्रिपुरा समेत कुछ अन्य राज्यों में भी राजनीतिक गतिविधियां संचालित की हैं, लेकिन अभी तक वह बड़े स्तर पर चुनावी सफलता हासिल नहीं कर सकी है। स्वयं शांतनु दे ने स्वीकार किया है कि सीमित संसाधनों और वित्तीय चुनौतियों के कारण पार्टी का विस्तार अपेक्षित गति से नहीं हो पाया।

ऐसे में अचानक 20 सांसदों के कथित विलय की खबर ने इस छोटे से दल को राष्ट्रीय सुर्खियों में ला दिया है। राजनीतिक विशेषज्ञों का कहना है कि यदि यह दावा सही साबित होता है तो NCPI की राजनीतिक स्थिति में बड़ा बदलाव आ सकता है।

हावड़ा कार्यालय के बाहर बढ़ी सुरक्षा

इस पूरे घटनाक्रम के बाद हावड़ा स्थित NCPI कार्यालय के बाहर सुरक्षा व्यवस्था भी बढ़ा दी गई है। स्थानीय स्तर पर राजनीतिक गतिविधियों में तेजी देखी जा रही है और मीडिया का जमावड़ा भी लगातार बढ़ रहा है।

सूत्रों के अनुसार पार्टी नेतृत्व जल्द ही एक प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित कर पूरे मामले पर अपना आधिकारिक पक्ष रखने की तैयारी कर रहा है। माना जा रहा है कि इस प्रेस वार्ता में पार्टी विलय, सांसदों के दावों और भविष्य की रणनीति को लेकर विस्तार से जानकारी दी जा सकती है।

सुरक्षा बलों की मौजूदगी और बढ़ती राजनीतिक हलचल ने इस पूरे घटनाक्रम को और अधिक चर्चा का विषय बना दिया है।

कानूनी और संवैधानिक चुनौती

अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या 20 सांसदों द्वारा किया गया यह दावा कानूनी और संवैधानिक कसौटी पर खरा उतर पाएगा। भारतीय संविधान और दल-बदल विरोधी कानून के तहत किसी भी राजनीतिक दल से अलग होने या नए समूह के गठन के लिए विशेष नियम निर्धारित हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि केवल घोषणा कर देने से राजनीतिक विलय मान्य नहीं हो जाता। इसके लिए संबंधित दलों की औपचारिक सहमति, आवश्यक दस्तावेज और संवैधानिक प्रक्रिया का पालन करना जरूरी होता है। लोकसभा अध्यक्ष की भूमिका भी ऐसे मामलों में महत्वपूर्ण मानी जाती है।

यही कारण है कि राजनीतिक पर्यवेक्षक इस पूरे मामले को केवल राजनीतिक बयानबाजी या दबाव की रणनीति के रूप में भी देख रहे हैं। कुछ विश्लेषकों का मानना है कि यह घटनाक्रम बंगाल की राजनीति में शक्ति संतुलन को प्रभावित करने की कोशिश हो सकता है।

बंगाल से दिल्ली तक चर्चा

फिलहाल इस कथित विलय ने पश्चिम बंगाल से लेकर दिल्ली तक राजनीतिक हलकों में हलचल बढ़ा दी है। TMC की ओर से इस मामले पर विस्तृत प्रतिक्रिया का इंतजार किया जा रहा है, जबकि NCPI नेतृत्व भी स्थिति स्पष्ट करने की तैयारी में है।

जब तक आधिकारिक दस्तावेज और औपचारिक प्रक्रिया सामने नहीं आती, तब तक यह मामला राजनीतिक अटकलों और चर्चाओं का केंद्र बना रहेगा। आने वाले दिनों में यह स्पष्ट हो सकेगा कि 20 सांसदों का यह दावा वास्तव में किसी बड़े राजनीतिक बदलाव की शुरुआत है या फिर यह केवल राजनीतिक दबाव बनाने की एक नई रणनीति साबित होगी।

फिलहाल एक बात तय है कि इस घटनाक्रम ने बंगाल की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है और सभी की निगाहें अब अगले राजनीतिक कदम पर टिकी हुई हैं।

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